हे अर्जुन ! सुनो ज्ञानयोग, भक्तियोग व कर्मयोग क्या है ? – भगवान श्री कृष्ण

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कर्मयोग

योग शब्द का उदय अति पुरातन काल से ही वेदों से हुआ है। महर्षि पतंजलि, महर्षि घेरंड, दत्तात्रेय एवं योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण सहित अनेको ऋषि योग के उपदेशक व मार्गदर्शक हुए है।भगवान श्री कृष्ण ने मानवमात्र के लाभार्थ योग को मुख्य तीन भागो में बाँटा है. १. कर्मयोग      २. ज्ञानयोग       ३. भक्तियोग

आसक्ति रहित व फल की इच्छा रहित होकर निष्काम भावना से भाव युक्त होकर किया गया कर्मयोग हो जाता है। 

गीता में कर्म का अर्थ कर्तव्य है, प्रत्येक मनुष्य कर्म अर्थात कर्तव्य पूर्ण किये बिना ही, अपने कर्मफल अर्थात अधिकार के लिए संघर्ष करता है, और  कुछ हाथ न लगने पर दीन-हीन होकर अश्रु बहाता है।

श्री कृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा है कि तेरा अधिकार तो अपने कर्तव्य कर्म करने का है फल का मिलना या न मिलना तेरे वश की बात नहीं।

जो कर्म करेगा वह फल पायेगा ऐसा माना जाता है ,यह निश्चित नहीं की अभीष्ट फल उसे मिलेगा ही अतः फल में आसक्त मत हो।

भगवान श्री कृष्ण के इस उत्तर पर अर्जुन अर्थात एक जिज्ञासु के मन में प्रश्न उठता है कि यदि इच्छित फल न मिले तो कर्तव्य ही क्यों करू ?

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय 02 का श्लोक 48 के अनुसार

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते । ।

अर्थात :-  हे धनंजय! आसक्ति (किसी चीज से विशेष लगाव) छोड़कर योग के स्थित होकर अर्थात स्थरचित होकर योग की सिद्धिया (सफलता) असिद्धि(विफलता) को समान मान कर अपना कर्म कर ।

१. कर्म के सिद्ध होने या असफल होने पर दोनों ही आवस्थाओ में एक सामान रहने वाली समत्वबुद्धि का नाम ही योग है। क्योंकि बुद्धि कि सभ्यावस्था से सकाम कर्म (फल की इच्छा करके कर्म करने) कि स्थिति बहुत ही नीची है ।

इसलिए हे धनंजयः! तुम समत्वबुद्धि कि शरण ले । फल पर नज़र रख कर कर्म करने वाले लोग अत्यन्त दीन गिने जाते है ।

योग वसिष्ठमें एक प्रसंग आता है जिसमे श्री राम ने पूछा- मुझे बतलाइये कि मुक्त पुरुष कर्म क्यों करे ?

तब वसिष्ठ जी ने उत्तर दिया :-

ज्ञस्य नार्थ: कर्मत्यागैनार्थ: कर्मसमाक्ष॓य ।

तेन स्थितं यथा यद्यत्तत्तयैव करोत्य्सौ ॥

ज्ञानी पुरुष को कर्म करने या कर्म न करने से कोई लाभ नही लेना होता । अतएव जैसा भी जो प्राप्त हो जाए कर्तव्य में किया करता है।

जीवब्रह्म कि एक रूपता को जान लेना ही ज्ञान है और ज्ञान के साथ आत्मा का जुड जाना ज्ञानयोग है। सब संशयो का नाश होना अर्थात कर्मयोग में जिसे अकर्म और अकर्म में कर्म दिखाई दे। वहीं मनुष्य सब मनुष्यों में ज्ञानी और युक्त अर्थात योगयुक्त है और वहीं कर्मयोग है।

अमानित्वमदम्भित्व्म्हिंसा क्षान्तिरर्जवम ।

आचार्योपासनं शोचं स्थैर्यमात्मविषिग्रह: ॥१३/७ ॥

इंद्रियार्धेषु वैराग्यमनहड़्∙कार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधि दुःखदोषानु दर्शनं ॥१३/८॥

असक्तिरनभिष्वड़्∙ग: पुत्रदारगृहादिषु ।

नित्य॓ च समाचित्तवमिष्टानिष्टाषपत्तिषु ॥ १३/९॥

मयि चनन्ययोगेन भक्तिख्यभिचारिषी ।

विवक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३/ १०॥

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम् ।

एत्ज्ज्ञानमिति  प्रोक्तमज्ञानं यदतोज्न्यथा ॥१३/११॥

अर्थात :- मानहीनता, दम्भहीनता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इंद्रिय-विषयों से वैराग्य अहंकार- शुन्यता जन्म-मृत्यु-वृदावस्था व व्याधि सम्बन्धी दुःखो तथा दोषों को समझना, आसक्ति का आभाव, पुत्र, स्त्री और ग्रहादि में आसक्ति या मोह का नही रहना, इष्ट या अनिष्ट कि प्राप्ति पर सदा चित्त को  एकाग्र रखना मुझमे अनन्य भाव से अनन्यभक्ति रखना चुने हुए एकांत स्थान पर रहना और साधारण भीड़ को पसंद करना, नित्य ही अध्यात्म ज्ञान में स्थिति और तत्व ज्ञान के अर्थ का आलोचन अर्थात अमानित्वादि ज्ञानसाधनों कि परिपक्व भावना से उत्पन्न होने वाला जो तत्वज्ञान है, उसका अर्थ जो संसार कि उपरतिरूप मोक्ष है, उसका आलोचन इस सब को ज्ञान कहते है इससे भिन्न जो कुछ है वह अज्ञान है ।

मनुष्य को ज्ञान कैसे हो सकता है ?

जब तक मन नही मरा, तब तक वेदांत का ज्ञान नही लगता । सहस अंकुश टहनियों और पत्तोवाले संसाररूपी वृक्ष कि जड़ मन ही है।

जो हाथ से हाथ दबाकर, दांत से दांतों को भींचकर कमर कसकर अपने मन इन्द्रियो को वश में कर लेते है, वे ही इस संसार में बुद्धिमान एव भाग्यवान है। उनकी ही गिनती देव पुरुषो में होती है। मोह भी मनुष्य का शत्रु है। अर्जुन बड़े मोह में पड़ा  था। जब कि श्री कृष्ण ने ज्ञानयोग दिया तब उसे समझ आया कि हरी अपना है बाकि सब सपना है | बार-बार आत्मचिंतन करने से आत्मा में हमारी स्थिति हो सकती है।

प्रभु अर्पण बुद्धि से की गयी भक्ति भक्तियोग है ।

 

योगिनामपि सर्वेषां मदगतेनान्तरात्मना ।

श्रद्धावान्भणते यो मा स में युक्तात्मा मत: ॥६/४७ ॥

अर्थात :- सब योगियों में भी मै भी उसे ही सबसे उत्तम सिद्ध योगी समझता हुँ, जो मुझे अंत:करण में रखकर श्रद्धापूर्वक मुझको हृदयगम कर भजता है। मुझ में समाहित किये हुए अन्तरात्मा से मुझे भजता है अर्थात भगवान में अच्छी  प्रकार स्थिर किये हुए अन्तरात्मा से भगवान्  को भजता है ।

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