ध्यान में उतरने की विधि क्या है ? ध्यान सीखने के लिए क्या करना होगा ?

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ध्यान

तुम्हे क्या लगता है ? भीतर जो इमारतें तुमने

खड़ी कर रखी है,मान्यताओ की … कल्पनाओ की ..

कुछ जान लिया ही मैने … जब तक मै इन सबको

गिरा दूंगा तब तक ध्यान तुम्हे मिल जाएगा।

जिस नीव पर तुमने संसार का महल खड़ा किया है ,

उसी नीव पर ध्यान की नीव मैं कभी नहीं रखूंगा।

जब तक कि तुम्हारी अब तक की सारी शिक्षा तुम्हारा

सारा ज्ञान … तुम्हारी सारी जानकारी ,

इससे तुम पकड़ नहीं छोड़ देते,तब तक ध्यान

सम्भव नहीं। कबीर ने तो सीधा-सीधा, साफ़-साफ़

कह दिया था कि जो घर बारे आपना वो चले

हमारे साथ जो तुम्हारे हाथों में तुमने पकड़कर

रखा हुआ है, जब तक तुम इसको नहीं छोड़ देते

तब तक.. ध्यान तो क्या.. कुछ भी तुम्हे मिल जाएगा

इसमें संदेह है। तुम्हारे हाथ जब खाली होंगे, तभी

ग्राहता आएगी, पात्रता आएगी। जिस दिन भीतर

के महल चूर-चूर हो जायेगे… उस दिन जो बचेगा

वही ध्यान होगा। मिट जाने का नाम ही तो ध्यान है

मैंने संतो से बचपन में सुना था ,कि इस जहान

में इंसान ने केवल दो ही चीजें बनाई है.. और वो हैं

मैं और मेरी.. बस दो ही चीजें इंसान ने बनाई है..

और फिर इंसान की नज़र में इनकी बहुत कीमत है

स्वभाविक है… खिलौने की कीमत किसी बालक

की नजर में बहुत होती है…

मुझे याद है आज भी बचपन में मैने एक लकड़ी की

पेटी में कुछ पौधे लगाए थे.. बहुत छोटे-छोटे पौधे

थे, पर मेरे लिए कीमती थे.. और अनजाने में वो

किसी ने बेकार समझ कर तोड़ दिए फैंक दिए

और मै सारा दिन सबसे नाराज रहा बहुत रोया भी

कि मेरे पौधे क्यों उखाड़े ?

इतना सरल नहीं है इन सबसे बाहर ले आना…

इसके लिए तो सिर्फ एक ही उपाय है, जो सहज है…

वो ये कि तुम्हारी चेतना के स्तर को उन्नत

किया जाये… विकसित किया जाए, तांकि तुम

भी उसी नजर से देख सको, जिस नज़र से मैंने

देखा है।  इसके लिए तुम्हारा पूरा-पूरा सहयोग यदि

मिले तो ही यह संभव है। मेरे पास एक व्यक्ति

आया, सालों से परिचित था, मुझे आकर कहने लगा

कि ध्यान करना है, मेने कहा ठीक है, कभी

सिखा दूँगा, बात आई-गई हो गई।  फिर कुछ दिन

बीते वो फिर से आ गया और कहने लगा। मैंने पहले

भी कहा था की मुझे ध्यान सीखना है, आप सिखाते

नही, आप सारा दिन ध्यान करते है.. कभी

मुझे भी तो चखाओ इसका स्वाद, कैसा

होता है।  मैं भी तो जानू आखिर किस बला

का नाम ध्यान है। खैर वो बहुत जिद्द

करने लगा तो फिर मुझे कहना पड़ा की कभी फुर्सत

से सारे दिन के लिए बिल्कुल खाली होकर आना मैं सिखा दूंगा।

कुछ महीने बीत गये फिर उसने

मुझे कभी नहीं कहा की ध्यान सिखाओ, मै भी समझ

गया की फुर्सत में नही आया होगा अभी…

कुछ समय के बाद वो मेरे पास आया और जिद्द करने

लगा कि मेरे साथ तीर्थ यात्रा पर चलो…तीर्थ भी हो जाएगा

और ध्यान भी… मैंने कहा कि तुम्हारे जाने का निमित

उदेश्य यदि तीर्थ करना है तो ध्यान बिल्कुल नहीं

हो पाएगा, पर वो नही माना, आखिर मुझे

उसके साथ चलना पड़ा। वही हुआ, वहाँ पहुंचकर

उसके मन में होड़ लग गई कि कोई देवी-देवता

रह न जाय, मैंने कहा किसी एक मंदिर में बैठ जाते है

यहीं बैठ कर जप- भजन व ध्यान करेंगें |

पर उसका मानना था कि जितने भी प्राचीन मंदिर है,

मै उन सबका दर्शन कर लूँ ,

फिर एक बार नहीं कई-कई बार…

ठीक है इसमे कोई बुराई नहीं,

सो मैने भी ऐतराज नही किया…

पर बीच-बीच मे वो मुझसे एक ही बात

कहता बार-बार, कि सिखाओ ध्यान, बताओ

भी कैसे करते है… जैसे ही मै कभी-कहीं थोड़ी

बहुत कोशिश करता… ध्यान में ले जाना भी, फिर अचानक

उसे याद आ जाता कि फ्ला-फ्ला मंदिर के

किवाड़ खुलने का समय हो गया है.. और वो

दर्शन बड़े दुर्लभ हैं। बहुत कम समय के लिए खुलते

है। चलो चले…. फिर दूसरे दिन, तीसरे दिन

ऐसे ही चलता रहा.. पर उसका मुझे कहना जारी था

कि ध्यान सिखाओ…. आखिर तंग आकर मैने

उसे कहा चलो मेरे साथ मै अभी सिखाता हूँ..

उसने पूछा कहा जाना है, मैने कहा ध्यान सिखना है

तुम्हे… उसने फिर पूछा, पर इसके लिए कही जाने

की क्या जरूरत, आपने ही कहा है की ध्यान

के लिए कही आने-जाने की जरूरत नहीं होती…

आप जहा हो, जिस पल में हो, वही ध्यान लग सकता

है, तो फिर.. मैने कहा जब सीख लोगे तब कहीं भी बैठ कर करना

वो मान गया.. हम अयोध्या में थे | मैं उसे सरयु नदी के तट पर ले गया

और उसे कहा की लगाओ इस में छलांग, नदी काफी गहरी थी

उसने कहा इसमें मैं डूब जाऊंगा, और मर भी सकता हूँ,

पर आप कहते हो तो किनारे किनारे स्नान कर लेता हूँ |

मैंने कहा अभी कूदो उसने कहा इसका ध्यान से क्या सम्बन्ध है  |

बहुत कहने पर भी वो नहीं कूद पा रहा था काफी देर किनारे बैठा रहा,

शायद सोच रहा था अगर कूद गया तो क्या होगा |

फिर मैंने उसे बताया की यदि तुम्हारा मन बाहर की भटकन में इतना व्यस्त है

और उसे बाहर घूमने का इतना रस है तो वेह भीतर नहीं उतर पाएगा |

क्योंकि मन भी जानता है की अगर भीतर उतरा तो मिट जाऊंगा |

और मन मिटना नहीं चाहता इसलिये वो बाहर और भगाता है कि

आप अपना एकांत याद ही न कर सको | और अगर कोई पानी में डूब रहा हो

तो वह अपना शत प्रतिशत बल बचने के लिए प्रयोग करेगा,

फिर उसे खाने पीने व घूमने आदि का ख्याल नहीं सताएगा,

फिर उसकी एक ही तीव्र चाह होगी, सिर्फ एक कि बचना है मुझे |

ठीक ऐसे ही यदि कोई अपनी पूरी जीवन उर्जा को बाहर से हटा कर

सजगता पूर्ण अपने भीतर के मौन में उतर जाए

तो वह स्वयं ही ध्यान में उतर जाएगा |

to be continued

-नित्यानन्दम श्री

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2 COMMENTS

  1. Guruji pradam ,,, m apke is vkya se kafi prerit hua hu,,, Mera visvas or bhi majbbot hua ,,,h ,,, aap bhatko Ka jivan smbhal lete ho ,,, danyabaad,,, koti koti pranam

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  2. दिमाग कभी खाली नहीं रहता। ध्यान के समय क्या करूं क्या सोचू।

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