हम अक्सर अशान्त हो जाते हैं, चिन्तित रहते हैं, उसका एक ही कारण है

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ये पंछी, ये जीव- जन्तु, सब कितनी चैन की नींद सोते हैं और ताजे होकर सुबह कितनी जल्दी उठ जाते हैं, क्योंकि परमात्मा ने इनके मन को ऐसी ताकत ही नहीं दी कि ये कल के बारे में सोच सकें, कल क्या हुआ, ये सब भूल जाते हैं, और कल क्या होगा इसका भी इन्हें ख्याल नहीं, हम अक्सर अशान्त हो जाते हैं, चिन्तित रहते हैं। और घबराहट महसूस करते हैं, एक अन्जाने से डर से घिरे रहते हैं, उसका एक ही कारण है कि जो कल अब बीत चूका हमें भूलता नहीं, हमसे छूटता नहीं, हम उसे उम्मीदों और आशाओं की बनावटी सांसें दे-देकर उसे जीवित करने की नाकाम कोशिशें करते चले जा रहे हैं , कि शायद वो जी उठे , लेकिन अंजान है इस बात से कि बहती नदी को रोका नहीं जा सकता, और जो नदी रुक जाए वो सड़ जाती है उसका सारा पानी भी, इसे रोकना अर्थहीन है , दूसरा जब हम लगातार असफल होते जाते है, तो एक पीड़ा, एक घबराहट, दर्द, चिन्ता या जो कुछ भी उसे कहो उससे हम घिर जाते है, इसमें सरासर हमारी नादानी है। हम अनभिज्ञ हैं, अनजान है इस बात से कि इस उधेड़-बुन में हम अपने आज का, इस जीवन का इन संभावनाओ का गला घोटे जा रहे हैं।

सिर्फ इतना ही नहीं , एक कल और है, जो काल बनकर सदा हमारे सिर पर खड़ा है। उसे भविष्य कहो, आने वाला कल कहो या फिर जो भी , उसको भी हम साथ-साथ पकड़ कर रखना चाहते हैं। हमारी पूरी कोशिश रहती है कि मैं इसका भेद पा लूँ , जान लूँ कि क्या छुपा है , इस बंद लिफाफे में , इस अंडे में क्या है , तोड़कर देखू जरा , यह फूट जाये अभी और मैं जान लूँ और हमारी इसी बात का फायदा ज्योतिषों को मिलता है।  बेचारों का भी कोई कसूर नहीं , उनकी रोज़ी है , उनका तो काम है कि अंडे में मुर्गा या मुर्गी अभी बनी ही नहीं कि पहले ही तोड़कर दिखा देना। प्रश्न और जिज्ञासा अभी उठी और यहा समाधान तैयार । लेकिन उनका कोई दोष नहीं , दोष है तुम्हारे पागलपन का ,दोष है तो तुम्हारे असन्तोष का कि जो बीज अभी फूटा नहीं और उसकी तुम कटाई भी कर लेना चाहते हो, बस ,

आँखें चाहे भविष्य पर टिकी हों , या फिर बीते हुए कल पर, हमे चल रहे वर्तमान मतलब आज से दोनों ही दूर करती हैं।  हमारे जीवन के आनंद से ये दोनों बातें ही हमें वंचित करती हैं ।  दो तो क्या , हमें परेशान करने के लिए , जीवन की सुघन्ध छीनने के लिए कोई एक ही काफी है।  मैंने कहा कि पंछी कल के बारे में नहीं सोचते, जीव-जन्तु कल के बारे में सोच नहीं सकते , वे मज़े से जी रहे हैं , क्योंकि कल क्या होगा, क्या खाएंगे क्या पियेंगे, कहा जायेंगें, यह सब ये नहीं, जितना वे खा सकते है उतना ही चोंच में उठाने की ताकत मिली है, कल के लिए जीवन में कोई जगह नहीं, कल के लिये संग्रह नहीं करते, तो मैंने इतना कहा नहीं कि कई लोग मेरी इस बात का गलत अर्थ लगाने के लिए तैयार खड़े हैं, वे थे ही इसी इंतज़ार में वे तुरन्त सवाल करते है कि क्या फिर हम धन इकठ्ठा न करे, छोड़ दे दुनियादारी, छोड़ दे फ्यूचर प्लैंनिंग। शरीर तो काम करने में हमेशा साथ देगा नहीं और जब शरीर साथ नहीं देगा तब क्या खाएंगे, कैसे जियेंगें? ये उनकी अर्थ लगाने की सीमा है, इसमें उनका कोई भी दोष नहीं।  बेचारे पहले ही परेशान है, बीते हुए और आने वाले कल से, इस कल नाम के काल से वे सताये हुऐ हैं।  दरअसल मेरा ये मतलब नहीं था की धन का अर्जन करना / इक्कठा करना बुरा है, या आर्थिक उन्नति अपराध है, या समृद्धि के मैं खिलाफ हूँ, नहीं बिल्कुल नहीं अगर धन या साधन न इकट्ठा करना ही समाधान होता तो फिर बात ही और थी, यहां तो सच्चाई कुछ भिंन है, कुछ और है….

मुझे एतराज़ आपके बैंक बैलेंस या आपके व्यपार से नहीं, मुझे एतराज है तो आपकी फिजूल खर्ची से, ध्यान देना, धन की फिजूल खर्ची से नहीं, इस मन की फिजूल खर्ची से, जो आप हरदम किये चले जा रहे हैं। कुछ न कुछ सोच-सोच कर, मै यह भी नहीं कहता कि सोचना बुरा है, सोचना बुरा नहीं, सोचना यदि सीमित समय या काल तक हो, सोचना यदि ऐछिक एवं अपनी निगरानी में हो तो यह स्वर्ग है।

सोचना बुरा नहीं है, हर समय सोचने की आदत बुरी है, और ये आदत धीरे-धीरे बीमारी की रूप ले-लेती है, एक रोग बन जाती है, और उस रोग का ही फल है अशान्त जीवन, असहाय व असहज जीवन तथा असन्तोष।  इन सब की जड़ है हमारे मन का बेमतलब चलना।  जरुरत ना  होने पर भी जो खाता जाये, दस्त तो होगा ही, ऐसे ही जब हम हर समय सोचने के आदी हो जाते हैं तो हमे हो जाता है तनाव | इस तनाव का यदि उपचार ना हो तो, बिगड़ कर वही रोग बन जाता है अवसाद (डिप्प्रेशन), इस तनाव से छुटकारा पाने के लिये लोग छुट्टियां लेकर घूमने-फिरने जाते हैं कुछ दिन या मंदिरो, मस्जिदों में या फिर किसी ऐसी जगह, जहाँ वे सोचने की आदत से बाज आ सके, जहां जाकर ये सोच थम जाये।  तभी तो मनोवैज्ञानिक  हुए और हो रहे है या बन रहे हैं, वे क्या करते हैं वे कोई दवा नहीं देते, बल्कि सोचने के इस पागलपन से बाहर निकालने की युक्तियां लगाते हैं।

छुट्टी वाले दिन हम तरो ताज़ा हो जाते हैं, इसके पीछे कारण यह भी है कि जाने अनजाने में हम मन को विश्राम देते हैं, शरीर के विश्राम का भी अपना एक महत्व है, लेकिन मन के विश्राम के बिना शरीर का विश्राम भी कारगर नहीं।  आपने अनुभव किया होगा, जिस रात नींद में आपका मन चलता रहता है या फिर रात भर सपने आते रहें, सुबह आपका शरीर भी थका होगा, फिर रातभर सोने से भी थकान दूर नहीं होती।

क्योंकि मन ही चलता रहा, भागता रहा, दौड़ता रहा, हालांकि शरीर से आप बिस्तर पर लेटे रहे, लेकिन मन भाग रहा था, सपने में पीछे शेर, भालू या फिर भूत लगा था।  मन ही मन आप भागने लगे और मन थकने लगा और फिर मन की थकान शरीर पर आने लगी, पूरा शरीर पसीने से भीग गया।  कभी-कभी घण्टो-घण्टो तक परिश्रम करके भी दो बूँद पसीना नहीं आता।  यहाँ शरीर पड़ा है, कोई हरकत नहीं, फिर भी शरीर पसीने से लथपथ है, साँस उखड़ रही है, जैसे सचमुच मीलों दौड़ा हो कोई, दिल भी तेज-तेज धड़कने लगता है, सारे लक्ष्ण भारी परिश्रम के दिखाई देते है, गला सूख जाता है, जैसा कि सचमुच में भागने से अक्सर सूख जाता है।  तो फिर इसे क्या कहें ? विज्ञान कहता  है कि शरीर से अनथक परिश्रम भी कर के कोई इतना नहीं थक सकता जितना मन से थकने पर इन्सान थक जाता है।  तभी तो जो मन से हार जाते हैं वे जीवन में कुछ नहीं कर पाते और जिनके होंसले बुलन्द होते है, वे माऊंट ऐवरेस्ट पर भी चढ़ पाते हैं, शरीर से भले ही वे बहुत कमजोर हो, दुबले हों लेकिन होंसले को मजबूत करना सीख लिया, ऐसे लोग शरीर के साथ-साथ मन से भी सही काम लेना सीख गये होते हैं, तभी तो ऐवरेस्ट के शिखरों पर होते हैं वे, और जो मन से हारा, जो मन से सहमा, वो दो कदम भी नहीं चल पाता, फिर चाहे वो कुँए पर ही क्यों न पहुँच गया हो, वो प्यासा ही मरेगा।  आप हैरान होंगे शायद ये सुनकर कि घण्टो चलने से भी जो जीवन की उर्जा खर्च नहीं होती, कुछ मिनट मन से पागल सा होकर दौड़ने / सोचने से वो जीवन की उर्जा नष्ट हो जाती है।  जो उर्जा शायद जीवन के विकास में, जीवन के उत्थान में काम आ सकती थी, इतना नास / ह्रास होता है, इतना नुक्सान है इसमें…

छुट्टियो पर घूमने जाने से हम ताजा-ताजा महसूस करते हैं, हम फ्रेश हो जाते हैं कुछ लोग कहते हैं हम मंदिर जाकर चार्ज हो जाते है, वो चार्जिंग मंदिर जाने से कम, मन के रुक जाने या कुछ समय के लिए किसी चीज पर टिक जाने से मिलती है |  कुछ लोग तो ऐसे ग्रस्त है इस रोग से, मंदिर में बैठे है, फिर भी परेशान हैं, अब क्या हुआ अब चार्ज नहीं हुए, नहीं अब मन ने मंदिर से भी भागना सीख लिया, मन के लिये किसी भी दीवार को फांदना मुश्किल नहीं, क्योंकि मन कहता है ये तो वही मंदिर है, जहाँ मैं रोज़ आता हूँ ये तो सब देखा हुआ है मन रूचि लेना बन्द कर देता है और भाग निकलता है बड़े यत्न किये गये हैं, मंदिरो में कि मन न भागे, घंटे लगाये गये है, भगवान के स्वरूप प्रतिष्ठित किये गये हैं, कहीं-कहीं तो मँदिर की दीवारों व भगवान् के विग्रह तक को सोने-चांदी और हीरों से जड़ दिया गया कि शायद तुम्हारा मन ये सब देख कर खिंच जाये, पर धीरे -धीरे मन कहता है ये तो देखा हुआ है, और मन भाग निकलता है, किसी और यात्रा पर जो अभी नहीं देखा हुआ, लोग दुनियां घूमते है इसी मन की खातिर कि इसे कुछ ऐसा मिल जाये जो न देखा हुआ हो, जो इसे खींच ले अपनी ओर, जब कोई चीज़ खीचंती है तो मन कुछ समय के लिये बन्ध जाता है।

एक फिल्म जो पहली बार देखी तो बहुत मज़ा आया, दोबारा देखी थोड़ा कम मज़ा आया, तिबारा देखी तो मज़े का कोई अता पता नहीं कि कहा गया, ऐसा क्यों? क्योंकि मन कहता है, इसे तो मैं जानता हूँ, इसमें अब कुछ भी अंजाना बाकी नहीं, तो बंधना कैसा…

लोग समझते है कि फिल्म बड़ी मज़ेदार थी लेकिन एक सच ये भी है कि मन बंधा मन जुड़ा और मन ठहर गया कुछ समय के लिए बस, उसी ठहरने में मज़ा आ गया।  हमनें इस विज्ञान को तो समझने की तो कोशिश ही नहीं की, उल्टा ये समझ लिया कि शायद फिल्म में रस है।  हम दोबारा-दोबारा उसे देखने गये, वो मजा नही आया फिर कोई नई फिल्म के आने का इंतजार कम करने लगे, पहले ही दिन के पहले शो में पहली पंक्ति में हम पहुँच गये, ओर फिर मज़ा आ गया। ये मज़ा टुकड़ो में है, ये तब तक है जब तक मन विश्राम में है, मन भागा कि मज़ा खत्म, और मन भाग ही जाता है|

to be continued…

– नित्यानन्दम श्री

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8 COMMENTS

  1. गुरु जी प्रणाम ,,,सही बात बता दी गुरु जी अपने ,,, मै भी में पर अभ्यास कर रहा हूं ,, और धीरे धीरे सुधार होता जा रहा है,, थोड़ा टाइम और लगेगा लेकिन सफलता मिलनी ही है,,, मै आपके साथ अपने अभ्यास साझा कर रहा हूं कि मै मन केसे काम करता हूं,,, अगर कोई सुधार की जरूरत हो तो बता देना,,,

    मै जिस काम करता हूं,,, उस वक्त इस सोच के साथ करने का प्रयास करता हूं,,, कि काम पहले से अच्छा हो,,, तो पूरा में वर्तमान में लग जाता है और इससे कम में भी सुधार आता है,, और जब मन को शांति मिलती है तो मन ठहर जाता है,,

    दूसरा ये कोशिश रहती है कि विचार कैसे चल रहे है ,,, विचारों की निगरानी करके सही और ग़लत विचार का पता कर लेता हूं,,, अगर विचार ,,, भूत या भविष्य की ओर चल रहा होता है तो लंबी अवधि की सांसों पर ध्यान केंद्रित कर के वर्तमान में लाने की कोशश करता हूं,,, केवल उन बातो या घटनयो से को दुखदाई है,,,

    तीसरा जब बिल्कुल खाली होता हु तो डीप ब्रीदिंग पर ध्यान केंद्रित कर लेता हूं,,,

    लेकिन गुरु जी ये मेरी कोशिश है,,, और मै सफल भी होता जा रहा हूं,,,अगर कोई सुधार की जरूरत हो तो जरुर बताए,,, धन्यवाद

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  2. गुरु जी आप को प्रणाम! आगे शायद आप बताएंगे उच्च शृंखल मन को कैसे नियंत्रित करें ? यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय थी जिस पर आप ने प्रकाश डाला l

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  3. Namaskar swami ji Mera name kanzariya Shailesh he aur me Jamnagar,(GUJARAT) se hu.
    Aaj aapne Jo ku6 bhi is post me kaha he wo 100% sahi he aur me aesi hi samsya se lad Raha hu mene pehle bhi aapke yaha Meri problem ke related mail Kiya he aur me aapse milna bhi chahta hu

    But long distance and 5 din pehle ka registration hone ke Karan milna sambhav nahi ho paya per is Diwali ke bad me aapse milna chahta hu.

    Aap please is post ko aage le jaiye aur is ka solution bataiye me aapko kafi time se follow kar Raha hu aap bahut achha Kam kar rahe he aapse direct bat ho sake to aapka bahut upkar hoga.
    Me Milne ki koshish kar Raha hu aap please is post ko continue karke is ka solution Kya ho sakta he wo batane ki Krupa kare.

    Aapse bat karne ke liye Kya karna hoga uska reply karna ho sake to..sukhriya bhagwan Sab ka bhala kare namaskar.

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    • Namaskaram!
      You Are Welcome to meet and greet with Nityanandam Shree
      with 5 days prior free booking and Kind attention please.
      You’ll only be allowed to meet maximum 10 mins.
      For more details call +917097979701 (cal 11am to 5pm IST)

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  4. Guruji man Ka ye vigyan aap se jaankar hum APNI uurja ko Sahi Disha de Kar aatm Vikas Kar sakte he.aap se Yesi or jaankari milti rahe yahi jigyaasa he.Namashkaarum???

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  5. Es man ko kese roke koshis kar ne par bhi y nhi rukha h or negative hi socha h etna ki Rona aaja jata h kbhi puri rat nikal jati but so nhi pate h ese kese roke aap hi btaye

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  6. Namaste Guruji, Please Post in English, So that Everyone from around the world can read and get benefit. Thank you. Namaskaram. ?

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