मूर्तिपूजा करना कहा तक ठीक है ! क्या आप इसके पक्षधर हैं ?

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idol worship

बात यह नहीं है कि मूर्ति में भगवान है कि नहीं बात यह है कि तुम्हारे पास जो आँखें है यह सिर्फ स्थूल को ही देख सकती है, सिर्फ स्थूल तक ही इसकी सीमा है, हवा सूक्ष्म है, इसे भी यह नहीं पकड़ पाती तो जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम है वहाँ तक तो इसके पहुँचने का सवाल ही नहीं ! मैं पक्षधर हूं, विपक्ष में हूं या फिर निष्पक्ष, इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैं भी उसी स्रष्टा की ही रचना हूं, मैंने भी उसकी एक धरती का थोड़ा सा भूखंड ही देखा है, अनंत ब्रह्मांड मापने का यंत्र यदि इतना छोटा हो और मापी  जाने वाली चीज अपार हो, असीम हो, तो क्या माप पूरा हो पायेगा। रात्रि के समय में अंधेरे कमरे में लगा पर्दा कभी-कभी तुम्हें ऐसा प्रतीत होगा कि जैसे कोई खड़ा है।  अब यह तुम्हारा भ्रम है, लेकिन जरा सोचो और ख्याल करो कि है तो पर्दा, लेकिन तुलना तुम इंसान से कर रहे हो, तो वह तुम्हारा भ्रम है, वास्तव में वहां जो कुछ भी है उसके द्वारा तुम अचंभित हुए, भयभीत हुए या जो भी तुम्हे अनुभूति हुई, क्या वह अनुभूति असत्य है ? देखा जाए तो कहां परमात्मा नहीं है।

यदि मूर्ति में भी छुपे उस ब्रह्म तत्व तक तुम्हारी नज़र पहुंच पाती है तो ठीक है, और यदि तुम्हारी नज़र उस स्थूल आकृति और रचना आदि पर ही अटक जाती है तो फिर वह तुम्हारे लिए किसी काम की नहीं, फिर तुम्हें अपने भीतर ही उस परमात्मा को खोजना होगा, यदि तुम ने जान लिया है कि यह सिर्फ पर्दा है तो अब कोई कितना भी कहता रहे कि यह कोई व्यक्ति खड़ा है, तुम कभी नहीं मानोगे।  हां शायद, कभी तुम वहां कोई व्यक्ति खड़ा है ऐसी मान्यता हटा कर देखोगे तो तुम उस पर्दे के प्रति स्वीकार भाव से भर सकते हो, यही साक्षात्कार है।  जो है, जैसा है, अपनी मति, अपना मूल्यांकन, अपनी समझ को बीच में ना ला करके उसको प्रत्येक रूप में अथवा अरुप रूप में अनुभव करना। यदि मूर्ति तुम्हारे समक्ष है, तो देख लो उसमें परमात्मा अपनी उस उसी भाव शक्ति द्वारा अपने भीतर के चैतन्य परमात्मा को उस में प्रतिष्ठित करो और उसका दर्शन करो, और यदि मूर्ति खोजने जाना पड़े कहीं दूर तो फिर यह झंझट भी क्यों करना? तुम स्वयं मूर्तिमान हो, स्वयं के तुम साक्षी बन जाओ, धीरे-धीरे हट ही जाओ, तुम्हारी मैं खो जाएगी, तो फिर रह जाएगा सिर्फ वही, सिर्फ वही… तुम्हारी खोज पूरी हो जाएगी।

फिर वही करेगा अपनी आंख से अपना दर्शन, जब तक तुम हो, तुम्हारी आंख से उसे पकड़ नहीं पाएगी, तुम चूक जाओगे, तुम्हे अपनी सीमित मति को उस असीम में मिलाना होगा, तभी हो पाएगा दर्शन।

सवाल उसके होने या ना होने का नहीं है, समस्या यह है कि तुम हो जब तक, तुम्हारा होना ही उसका खो जाना है, छुप जाना है और तुम्हारा खोना उसका हो जाना है… ॐ आनंद…. ॐ शांति….

नित्यश्री

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