आरग्वधादि क्वाथ Aaragvadhadi Kwath (दस्तावर) कब्ज़, पेट में गन्दगी की वज़ह से भूख न लगना आदि में लाभकारी : नित्यानंदम श्री

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आरग्वधादि क्वाथ (दस्तावर)

आरग्वधादि क्वाथ (दस्तावर)

सामग्री : अमलतास का गूदा 2 भाग, कुटकी 2 भाग, निशोथ 2 भाग, मुनक्का (बीज़ निकाला हुआ), 2 भाग, सनाय की पत्ती 2 भाग, बड़ी हरड़ की वक्कल 2 भाग, सूखे देसी गुलाब के फूल 2 भाग, गुलकंद 7 भाग ;

बनाने व खाने की विधि : अमलतास, मुनक्का और गुलकंद को छोड़कर सब जड़ी-बूटियाँ ओखली में कूट कर जौकुट चूर्ण कर लें अब ऊपर से अमलतास, कुटा हुआ मुनक्का और गुलकंद मिलाकर अच्छे से मिला कर रख लें | अब 20 ग्राम लगभग 4 चम्मच औषधि लेकर 250 मिली (एक गिलास) पानी में उबालें जब आधा पानी रहे तब छान कर पियें | इसे सुबह खाली पेट लेना सबसे अच्छा है |

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इसे पीने के पच्चीस मिनट तक हल्का भोजन किया जा सकता है | यदि इसे पीने के बाद घबराहट हो तो जल्दी भोजन कर सकते हैं | सुबह कभी समय की कमी के चलते या किसी अन्य कारण से सुबह इसे न पी पायें तो शाम को सूर्यास्त के समय से लेकर रात्रि भोजन से पहले भी ले सकते हैं, परन्तु सुबह लेने से ये ज्यादा लाभ करेगा | ये हल्का कड़वा हो सकता है | इसमें हालाँकि हल्का मीठा मिलाया जा सकता है पर ऐसी औषधियां यदि बिना मीठा मिलाये ली जाए तो ही पूर्ण लाभकारी सिद्ध होती हैं |

लाभ : आरग्वधादि क्वाथ (दस्तावर) की वज़ह से या अन्य किसी कारण से शरीर के किसी भाग में सूजन आ जाना और आँखे पीली महसूस होना, शरीर या पेट में गन्दगी की वज़ह से भूख न लगना और नया खून न बनना तथा शरीर पीला पड़ जाना, पेट में गांठे सी पड़ जाने पर या पेट को दबाने पर सख्त सा महसूस होने पर, नई या पुरानी कब्ज़, पेट में कुछ मल चिपकने की वज़ह से होने वाले बुखार में बहुत लाभकारी है | ये औषधि अनुलोमक है अर्थात पेट का मल दस्त द्वारा मलद्वार से बाहर निकालता है, इसलिए इसे दस्तावर और उदर शोधक भी कहते हैं | जब पेट खुलकर साफ़ होता है तो उस से भूख खुल कर लगने लगती है और साथ ही साथ गैस आसानी से बाहर निकलने लगती है | जिन बिमारियों के पीछे का कारण आंतो में रुका मल हो उसमें इसे दे सकते हैं | पेट साफ़ हो जाये तो चेहरे के मुहांसे आदि दाग साफ़ होने लगते हैं | चिकित्सकीय परामर्श से ही लें |

सावधानी : एक हफ्ता लगातार देने से आंतो की गन्दगी बाहर कर देता है | इसे बिना चिकित्सक के परामर्श के एक सप्ताह से अधिक लम्बे समय तक लगातार प्रयोग न करें क्युकी फिर इसकी आदत बन सकती है | कुछ दिन रुक कर फिर ले सकते हैं या फिर इसे सप्ताह में एक बार पेट की सफाई के लिए कोई चाहे तो ले सकता है |

पथ्य-अपथ्य : इस औषधि के साथ आहार / खान-पान का भी ध्यान रखें | हल्का सुपाच्य भोजन लें | बाहर का खाना ना खाकर घर का ही भोजन करें और छाछ व गाय का घी सेवन अपने आहार में करते रहें ताकि आंते तर रहें | वात बढाने वाले रूखे सूखे, ठन्डे, बासी, भारी भरकर, गैस बनाने वाले व खट्टे पदार्थों का भी परहेज रखें | पित्त बढ़ाने वाले गरम मसाले, अचार, लाल व काली मिर्च, चाय कॉफ़ी का परहेज रखें | कफ़ बढ़ाने वाले तले व चर्बी / वसायुक्त पदाथों का परहेज रखें | फ्रिज की चीजें न ही लें तो अच्छा |

विशेष : ऊपर दिए गए अनुपात (Ratio) को न बदलें | उबालने के लिए मिटटी का बर्तन या तांबे और पीतल का कलई किया हुआ बर्तन सबसे अच्छा है | स्टील या एल्युमीनियम के बर्तन में औषधि उबालना सही नहीं माना जाता | औषधि ढक्कन खोल कर उबालें इस से ये पचने में हल्का रहेगा |

-नित्यानन्दम श्री, आनन्दम आयुर्वेद

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