ध्यान : जीवन बगिया में खिला आनन्द पुष्प नित्यानंदम श्री

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ध्यान

ध्यान कोई क्रिया नहीं है, न ही कोई व्यायाम है | यह है मन का नहीं होना, शून्य हो जाना या मौन हो जाना और चित की इसी अवस्था में ही साक्षात्कार होता है | यह सिखाया नहीं जा सकता, इसे तो केवल जनाया जा सकता है | ये तो ऐसा पुष्प है जो तुम्हारे मन और बुद्धि के धरातल पर नहीं खिल सकता, इसके लिये मन का मौन होना अनिवार्य है | लेकिन हमारा मन लगा रहता है हर समय संसार के चिंतन में, ध्यान में उतरने के लिए संसार बाधा है, तुम्हें घेरा हुआ है…. थोड़ा -थोड़ा सबने…. किसी को परिवार ने, तो किसी को व्यापार ने…. जब एकान्त तुम्हें घेर लेगा, तभी यह घटित हो पायेगा | तुम शान्त होने का प्रयास करते रहते हो, ध्यान प्रयास से नहीं होता |

ध्यान तो प्रसाद से मिलता है …… ध्यान में प्रवेश तुम्हें संसार के साथ नहीं मिल सकता |

ध्यान के लिए तुम्हें बाहर की दुनिया को बाहर ही छोड़ना पड़ेगा, तभी ध्यान घटेगा भीतर, शून्य, निशब्द, निर्विचार व निर्विकार ध्यान ….

शान्ति का रस, झर-झर, झर-झर बहने को आतुर है, बस पलकें गिराने की देरी है | इसके लिए तुम्हें खुद के करीब जाना पड़ेगा | तुम्हारी प्यास बाहर भटकने से नहीं बुझ सकती, भीतर है समाधान, तुम्हारी समस्याओं का …. आओं भीतर चलें, तुम्हारा अस्तित्व तुम्हें पुकार रहा है, बाहें फैलाकर ……

बाहर का प्रकाश …. बाहर का सुख सीमित है, बाहर का विस्तार स्थायी नहीं, ये तो भीतर जो अनन्त असीम है, उसकी एक बूंद भर ही है | इस बूंद भर से तुम्हारे प्यासे उर की प्यास न बुझ पायेगी | आओ अब देर न करो …. इसे तुम पा लो …. यही धर्म है, इसी में जीवन की सार्थकता है |

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